मुर्दों से ज़िंदगी अब,माँगते हो क्यूँ भला?
सोये हैं चैन से, सताते हो क्यूँ भला..!!
अंतरा-१.
उजाड़े हैं बहुतेरे चमन, अभी तक तुने,
मुर्दों को अब इस तरह,सजाते हो क्यूँ भला..!!
सोये हैं चैन से, सताते हो क्यूँ भला..!!
अंतरा-२.
ज़िंदगी हँस - हँस के गुज़ारी थी जिसने,
मुर्दों पर अब अश्क तुम,बहाते हो क्यूँ भला?
सोये हैं चैन से, सताते हो क्यूँ भला..!!
अंतरा-३.
ज़िंदगी को अक्सर,किया है नंगा तुने,
मुर्दों को कफ़न तुम,बाँटते हो क्यूँ भला?
सोये हैं चैन से, सताते हो क्यूँ भला..!!
अंतरा-४.
फिरते रहे ज़िंदगीभर,बन कर काफ़िर,
ख़ुद को अब ख़ुदा,मानते हो क्यूँ भला?
सोये हैं चैन से, सताते हो क्यूँ भला..!!
मुर्दों से ज़िंदगी अब,माँगते हो क्यूँ भला?
सोये हैं चैन से, सताते हो क्यूँ भला..!!
मार्कण्ड दवे । दिनांक-१९-११-२०११.

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MARKETPLACE
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