[Gujarati Club] राशनकार्ड

 

`राशनकार्ड`- मुक्त छंद कविता ।


(courtesy-Google images)
 


न जाने बाबू ने राशन कार्ड से, मेरा  नाम  कैसे  मिटा दिया..!!
 
भूखा  था  कल  तक आज भी,पापी पेट को, मैंने समझा दिया ।


देता रहा रिश्वत,निवाला छिन,बच्चों  के मुँह से, भीखमंगों को, 
 
कहाँ से मिल गया,हाज़मा भारी,रिश्वत देकर, दरिंदे नंगों को ।


निगल  गया  हूँ न जाने कितने,ही कंकर - सड़े गेहूँ के साथ,
 
हज़म कर भी पाऊँगा,या लगेंगे न जाने मुझे और कितने साल?


सौ जन्म भी होंगे कम,ढूंढ पाऊँ जो,खुद  को, इन टूटे आईनों में, 
 
बहते आंसु, आहें, बुझी निगाँहें, ताउम्र कटी, इन लंबी लाईनों में ।


छाया है अंधेरा,बिना तेल मिट्टी के,झोंपड़ी और मेरे  ख़्वाब में भी,
 
आखिरी बार हो दर्ज,नाम राशन में, हो जाए रोशन चिता मेरी? 


न जाने बाबू ने राशन कार्ड से, मेरा  नाम कैसे मिटा दिया..!!
 
भूखा था कल तक आज भी, पापी पेट को, मैंने समझा दिया ।
 
मार्कण्ड दवे । दिनांक - ०५ -०४ -२०११.

__._,_.___
Reply via web post Reply to sender Reply to group Start a New Topic Messages in this topic (1)
Recent Activity:
.

__,_._,___

No comments:

Groups.yahoo.com (Yahoo Groups) Shutting Down

...